आज लोगों को राम-कृष्ण के आचरणों को अपनाने की जरूरत है-सन्त उमाकान्त जी महाराज

 जय गुरु देव

प्रेस नोट: 19.08.2022 महोबा (उ.प्र.)

आत्मा को कर्मों की माफ़ी और मुक्ति-मोक्ष वक्त के समर्थ सन्त सतगुरु के अलावा और कोई नहीं दिला सकता है

कृष्णजी के साथ 24 घंटा रहने वाले पांडवों को नर्क चौरासी में जाना पड़ा, आपने तो उनको देखा भी नहीं


अवतारी शक्तियां केवल कर्म फल देती हैं लेकिन समय के सन्त सतगुरु को कर्मों की माफी का भी अधिकार होता है ऐसे ही इस समय धरती पर मनुष्य शरीर में आये स्वयं प्रभु, जीवों को पिछले बुरे कर्मों की मिलने वाली सजा से बचाने वाले, जीते जी कृष्ण और अन्य देवी-देवताओं के दर्शन का रास्ता नामदान दे सकने वाले इकलौते मौजूदा वक़्त के महापुरुष सन्त सतगुरु दुःखहर्ता त्रिकालदर्शी परम दयालु उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त जी महाराज ने जन्माष्टमी के अवसर पर 19 अगस्त 2022 प्रातःकालीन बेला में महोबा (उ.प्र.) में दिए व अधिकृत यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर लाइव प्रसारित संदेश में बताया कि कृष्ण भगवान ने किस तरह से काम किया, त्याग किया, जीवों को बचाया इस पर प्रकाश डालना चाहिए। उनके अंदर की शक्ति का बोध कराना चाहिए। ऐसा पहले जब लोग करते थे तो आज की तरह से लोगों का खान-पान, चाल-चलन बिगड़ा नहीं था। जितने भी सन्त महापुरुष धरती पर आए, लोगों के लिए त्याग तपस्या किया, उस पर प्रकाश डालना चाहिए। सतसंग सुनाने से जो दया ऊर्जा शक्ति मिलती है उसको लेना चाहिए।

कृष्ण ने गीता में कहा समय के सन्त सतगुरु की खोज करो, उनसे रास्ता लो, वोही मुक्ति मोक्ष दे सकते हैं

महाराज जी ने 17 अक्टूबर 2020 को उज्जैन में बताया की कृष्ण भगवान को 16 कला के अवतार कहा गया। गीता भागवत पढ़ने वाले, कृष्ण भगवान की पूजा करने वाले उनको ब्रह्म मान लिए, उनको ही सब कुछ मान लिए। गीता के चौथे स्कंध के 34वें श्लोक में भी कृष्ण ने कहा सतगुरु की खोज करो और सतगुरु से रास्ता लो तब तुम्हारा उद्धार हो सकता है। गीता-रामायण पढ़ते हो लेकिन समझने की कोशिश नहीं करते हो। इसलिए समय के पूरे सन्त सतगुरु को खोज कर अपने असली निज धाम चलने की तैयारी अभी से कर लो। 

आत्मा को कर्मों की माफ़ी और मुक्ति-मोक्ष वक्त के समर्थ सन्त सतगुरु के अलावा और कोई नहीं दिला सकता है

सन्तों में केवल दयाल अंग होता है लेकिन अवतारी शक्ति में दयाल और काल अंग दोनों होते हैं। जैसे राम ने दया करके पत्थर को नारी बना दिया और जब युद्ध करने को हुआ तो धनुष उठा कर विनाश किया। कृष्ण ने भी बहुत समझाया लेकिन कौरवों द्वारा नहीं समझने पर सुदर्शन चलाया। उस चक्र को या तो बर्बरीक देखे थे या अर्जुन देखे थे। जब अर्जुन लड़ने से मना किये तो बोले इतने दिन साथ रहे लेकिन पहचाना नहीं? बैठो, ध्यान लगाओ, महाभारत दिखाता हूं। जब ध्यान में कुछ नहीं दिखा तो दोनों आंखों के बीच जहां तीसरा नेत्र, दिव्य चक्षु है, वहां पर ठोका और कर्मों के पर्दे को अपनी ताकत से हटाया। शिव नेत्र पर मनुष्य के कर्म, चोरी व्यभिचार हत्या लूटपाट झूठ मारकाट आदि कर्म जमा हो जाते हैं। दिखाया कि सब मरे पड़े हैं, महाभारत तो पहले ही हो गया तब गांडीव उठाया। युद्ध के बाद अहंकार में पांडव बोले मैने मारा तो कृष्ण बोले जिसने पूरा देखा वो बताएगा। बर्बरीक के सिर के पास गए तो बोला कि केवल चक्र सुदर्शन चल रहा था और बाकी सब मुंह फैलाये खड़े थे, किसी का हाथ-पांव भी नहीं हिल रहा था। बोला अब जाने दो तो कृष्ण बोले मेरा भी समय काम पूरा हो गया, मैं भी जाऊंगा। 

जब कृष्ण जी को शरीर छोड़ना पड़ा, 24 घंटा साथ रहने वाले पांडवों को नरक जाना पड़ा तो अपने बारे में भी सोचो

जब कृष्ण ने कहा अब मैं जाऊंगा, अब कलयुग आएगा, द्वापर जाएगा तब पांडवों को होश आया। जब कृष्ण को जाना पड़ रहा है तो हमको भी जाना पड़ेगा। पांडव बोले हमको अपने धाम साथ ले चलो। जब मना कर दिया तब बहुत रोये, चिल्लाए, विनती किया की इतने दिन आपके साथ इसी आशा में लगा रहा कि जब चलेंगे, लेते चलेंगे लेकिन असमर्थता दर्शाते हुए दो टूक जवाब उन्होंने दे दिया। कहा अवतारी शक्तियों में जीवों को पार करने की शक्ति नहीं होती है। वह तो धर्म की स्थापना, दुराचारीयों के संहार, शुभ-अशुभ कर्मों का फल देने के लिए आया करते है। किसी त्रिकालदर्शी सन्त की, समरथ गुरु की खोज कर उनसे रास्ता लेकर योग साधना करो तब तुम मेरे धाम, अपने धाम जा सकते हो, देख सकते हो। 24 घंटा साथ रहने वाले पांडवों को नर्कों में जाना पड़ा और आप यह सोचते हैं कि इनकी हम पूजा कर लेंगे, जिनको देखा भी नहीं आदमी ने और मूर्ति बनाकर स्थापित करके मान्यता दे दिया तो आप कैसे पार हो पाएंगे। जैसे चित्रकूट, जगन्नाथ, बद्रीका धाम आदि जहां आप जाते हो, ये आपका धाम नहीं है। आपके धाम में तो कोई दुःख नहीं है। सुख ही सुख है, आनंद ही आनंद है। जहाँ जाने के बाद फ़िर वापस नहीं आना पड़ता है। कृष्ण का धाम त्रिकुटी था, जहाँ से वो आये थे। 

जीवों को पार करने का काम सन्तों का होता है

इसलिए कृष्ण ने भी गुरु बनाये। बाहरी विद्या गुरु संदीपनी और आध्यात्मिक गुरु सुपच बनाया। कृष्ण मार नहीं सकते थे कौरवों को। उस समय जो सुपच सन्त थे, उनसे प्रार्थना किया कि आप अपनी दया की धार को समेटो नहीं तो पापियों का खात्मा नही हो पाएगा। वक़्त के सन्त अपनी दया की धार को मनुष्यों की रक्षा के लिए फैलाए रहते हैं। 11 दिसम्बर 21 को आजमगढ़ में बताया कि धृतराष्ट्र ने कृष्ण से पूछा मैं अंधा क्यों हो गया तो बताया कि 106 जन्म पहले के बुरे कर्म का फल भोग रहे हो। कर्म फल भोगना ही पड़ता है। केवल सन्तों को ही माफ़ी का अधिकार होता है। मौत को याद रखो। जिनको आप पूजते हो, भगवान मानते हो राम-कृष्ण मनुष्य शरीर में थे, वो भी चले गए। सोचो मौत के बाद आप कहां जाओगे।

एक म्यान में दो तलवार कैसे रह सकती है? आज भी कितने सतसंगियों के यहां होती है मूर्तियों की पूजा

12 सितम्बर 2020 को उज्जैन में बताया की आज भी कितने ही सतसंगियों के यहां मूर्तियां बनाकर के पूजा हो रही हैं। घर वालों को कभी समझाए? यह नाराज हो जाएंगे, लड़का नाराज हो जाएगा। पंजीरी नहीं बनी, फलाहार नहीं बना, झांकी नहीं सजाई गई, कृष्ण को झूला डाल कर के झूलाया नहीं गया। कभी असली चीज जानते हुए भी आप बताए? तो मन कहां लगा हुआ है? उधर ही लगा हुआ है।

आज राम-कृष्ण के आचरणों को अपनाने की जरूरत है

19 दिसम्बर 2021 को हमीरपुर में बताया कि घर-घर परेशानियों का सबसे बड़ा कारण राम-कृष्ण के आचरणों को अपनाया नहीं। 10 दिसम्बर 2021 को देवरिया में बताया कि कृष्ण-राम कथा, चरित्र पढ़ने के साथ-साथ उनका अनुकरण भी करना चाहिए। इसलिए इतिहास बनता है कि पढ़ो और उसके अनुसार चलो। 5 जनवरी 2022 को उज्जैन में महाभारत के बाद अश्वमेध यज्ञ की समाप्ति पर घंटा न बजने वाले द्रौपदी के प्रसंग से समझाया की भावना ही सब कुछ होती है, भाव नहीं खराब करने चाहिए अन्यथा काम नहीं होता, लक्ष्य पूरा नहीं होता। 10 अगस्त 2022 को रेवाड़ी में बताया की 16000 रानियों वाली बात भ्रम है, दन्त कथा है। गोपियों के प्रेम को, अंदर में बजती हुई बांसुरी को सुन कर सुध-बुध खो देने वाली गोपियों के बारे में बताया की उनका मन तो श्याम के साथ चला गया था। मन तो एक ही है दो नहीं। इसलिए नामदान देते समय बताई गयी शब्द नाम योग साधना में भी मन को दुनिया की तरफ से हटा कर प्रभु की तरफ लगाओ और अंतर में गुरु का जलवा देखो।



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