जय गुरु देव
प्रेस नोट:10.08.2022 रेवाड़ी (हरियाणा)
गुरु गोविंद सिंह जी के दृष्टांत से बाबा उमाकान्त जी ने समझाया- ढपोल शंख मत बनो, गुरु आदेश पालन, सेवा करो
मर्यादा में रहते हुए विभिन्न तरीकों से जीवों को उनकी भलाई की बात बताने समझाने वाले, गुरु आदेश का, सेवा का भारी महत्व समझाने वाले, पहले की तुलना में अब तो शॉर्टकट में ही अपने निज घर जयगुरुदेवधाम ले चलने वाले, बार-बार समझने के मौके देने वाले, इस समय धरती पर मनुष्य शरीर में आये स्वयं प्रभु, मौजूदा वक़्त के महापुरुष सन्त सतगुरु दुःखहर्ता त्रिकालदर्शी परम दयालु उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 9 अगस्त 2022 प्रातःकालीन बेला में बावल आश्रम, रेवाड़ी (हरियाणा) में दिए व अधिकृत यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर प्रसारित संदेश में गुरु गोविंद सिंह जी और धल्ला का दृष्टांत सुनाया और कहा कि दृष्टांत इसलिए सुनाया जाता है कि चीज को समझ जाओ और पकड़ लो और उससे फायदा लाभ मिलने लग जाये।
गुरु गोविंद सिंह जी और धल्ला का दृष्टांत
कुछ लोग ढपोल शंख होते हैं जो कहते ज्यादा और करते कम हैं। ऐसों को भी सन्तों ने सुधारा। समझा के, बता के, अनुभव करा के। एक बार दुश्मनों के सताने की वजह से गुरु गोविंद सिंह जी को आनंदपुर जगह छोड़नी पड़ी। तो उनका जानकार कह लो, धल्ला जो अपने को भगत, प्रेमी, नामदानी कहता था, एक दिन आया बोला गुरुजी आपने आनंदपुर क्यों छोड़ दिया? आपने हमको बताया नहीं, हम लड़ाई लड़ते। बोले जैसी मालिक की मौज। बोला वो आप जानो, हमको बताते तो हम आपके लिए जान दे देते। बोले अच्छा चल कुछ खा पी ले। उस समय कोई प्रेमी निजी रक्षा के लिए गुरुजी को आधुनिक हथियार (काली बंदूक) दिया था। क्योंकि जब कुत्ते सताते हैं तो हाथ जोड़ने पर नहीं मानते। उन्हें तो डंडा दिखाना पड़ता है। दुष्ट को भले ही मारो-पीटो भले न लेकिन दुत्कार दिखाओ तो घबरा जाते हैं क्योंकि उनमें ज्यादा हिम्मत नहीं होती है। तो जब धल्ला आया तो बोले इस आधुनिक हथियार की परीक्षा लेने आजमाने के लिए आदमी ला। उसके सब साथी खिसक गई कि इसमें जान जाएगी तभी तो पता चलेगा कि बंदूक कैसी है। बोला गुरुजी सब बुजदिल हैं। बोले तो कोई दिल वाला खोज। अब धल्ला का छूटा पसीना, बहस कर रहा था। उबले दूध पर पानी के छींटे मारने के समान हालत हो गयी। बोले तुझे तो कोई मिलेगा नहीं लेकिन हमको तो आजमाना है। जा अस्तबल में हमारे भगत हैं, घोड़ों की सेवा करते हैं। कह दे। जब कहा तो जो जैसा था भगा, कंघी करता, लुंगी पहनता, सब भागे की पहले हम पर आजमाया जाय, हम पिछड़ न जाये। होड़ मच गई। बोले खड़े हो जाओ तो भी आगे कूदते रहे कि गोली हमी को लगे। गुरुजी ने लगाया निशाना और नली का मुंह ऊपर कर गोली चला दिया।
तो बाप, बेटे को मारता है? बाप तो रक्षा संभाल करता है। गुर-शिष्य का रिश्ता बाप-बेटे समान होता है। तब धल्ला चिल्लाया रोया पछताया लेकिन चिड़िया चुग गयी खेत। उन्हें गोली चलानी नहीं थी, केवल परीक्षा लेनी थी की तन मन धन जब अर्पण कर दिया तो तेरा तो कुछ रहा ही नहीं। गुरु तो हिफाजत करते हैं। अब वो सतसंग की बातों को याद करता पछताता रहा।
पहली शिक्षा- समय के आदेश का पालन करो, तनिक सा भी मन कह दे तो तुरंत सेवा भजन नामध्वनी में लग जाओ
इन दृष्टांतों का मतलब समय के आदेश का पालन करना चाहिए। समय किसी का इंतजार नहीं करता है। मन पल-पल बदलता जाता है। एक सा मन नहीं रहता है। इसलिए जब मन में सेवा का भाव आवे तो तुरंत सेवा में लग जाना चाहिए। भजन में मन को लगाना चाहिए। तनिक देर के लिए भी मन ने कहा तो बैठ जाना चाहिए, देर नहीं करना चाहिए। क्योंकि सिनेमा की रील के समान कर्मों की रील भी चलती है। बुरे कर्मों की रील बैठने नहीं देगी। इसलिए जैसे ही अच्छे कर्मों की रील आती है तो मन कहता कि भजन सुमिरन कर लें नहीं तो समय निकल जायेगा तो फट से बैठ जाना चाहिए। मन तनिक भी कहे नामध्वनी बोलने की तो तुरंत अंदर में ही बोलने लगे जाना चाहिए। इससे ये शिक्षा मिलती है।
दूसरी शिक्षा- सेवा करने से कर्म कटते हैं
तो दिन-रात सेवा करो। जो गुरु कहें करो तुम सोई, मन के कहे करो मत कोई। गुरुजी जो भी सेवा दें, लगन विश्वास के साथ गुरु आदेश का पालन करना चाहिए। उससे, निःस्वार्थ भाव से सेवा करने से कर्म कटेंगे, निर्मलता आएगी, गुरु, प्रभु, अपनी पहचान होगी की मैं कौन हूँ। जिस काम के लिए ये मनुष्य शरीर मिला वो पूरा हो जाएगा, फिर लौट-लौट चौरासी में नहीं आना पड़ेगा। इसी योनि में जीवात्मा का कल्याण उद्धार हो जाएगा, जीवात्मा सतलोक सचखंड पहुंच जाएगी, गुरु सुरत की डोर को पकड़ कर शब्द की डोर पकड़ा कर वहां पहुंचा देंगे। बोलो जयगुरुदेव।
