सन्तों का एक लक्ष्य एक उद्देश्य कि जीवों को उनके असली घर वतन पहुंचाना

 जय गुरु देव

प्रेस नोट: 11.08.2022 उज्जैन (मध्य प्रदेश)

दिन-ब-दिन काल और माया चारा डालती चली जा रही, अच्छे-अच्छे लोगों की नीयत हो रही खराब

सतगुरु अपने जानशीन उत्तराधिकारी की पहचान कैसे कराते हैं

विश्व विख्यात निजधामवासी सन्त बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी, गुरु आदेश से नयों को नामदान देने और पुरानों की संभाल करने वाले, जैसे पिता देखता है कि मेरे बाद बेटे को बहुत काम करना है तो बेटे के लिए न केवल अपनी पूरी पावर बल्कि ज्यादा की व्यवस्था करता है ऐसे ही अपने गुरु अपने पिता से प्राप्त आशीर्वाद से कलयुग के सिंहासन को भी थर्रा चुके और अंततोगत्वा इसी कलयुग में सतयुग के प्रादुर्भाव का अपने गुरु का मिशन पूरा करने में जी जान से जुटे मौजूदा वक़्त के महापुरुष सन्त सतगुरु दुःखहर्ता त्रिकालदर्शी परम दयालु उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 3 मार्च 2018 सायंकालीन बेला में उज्जैन आश्रम (म.प्र.) में दिए व अधिकृत यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर प्रसारित संदेश में बताया कि सन्तों और शेर का निशाना चूकता नहीं है। सन्त जब जीव को पकड़ते हैं तो उनका कच्चा काम नहीं रहता कि चूक जाएं। क्योंकि उनका काम होता है कि

हम आए वही देश से जहां तुम्हारो धाम।
तुमको घर पहुंचावनो एक हमारो काम।।

एक लक्ष्य एक उद्देश्य कि हम तुमको तुम्हारे घर तुम्हारे वतन पहुंचा देंगे, केवल एक निशाना होता है। इस निशाना के अंतर्गत अंदर में डोर को बांध देते हैं कि हम जब चले जाएं, बीच में चले जाएं तो फिर उनकी संभाल कौन करेगा?

जीव को नाम दान देते समय काल से जीवात्मा की डोरी लेकर ऊपरी लोक में बांध देते हैं

मान लो सतगुरु ने अंतिम समय में नाम दान दे दिया तो उनके जाने के बाद कौन बढ़ाएगा, कौन समझाएगा, कौन संभाल करेगा, कौन सतसंग सुनाएगा, जीव कैसे विश्वास करेगा, कौन उनके जानशीन होंगे? इसलिए उसकी डोर पहले ही नाम दान देते समय काल के हाथ से लेकर के ऊपरी स्थानों में बांध देते हैं। सतलोक से वहां तक संभाल करने के लिए बराबर आते रहते हैं। जो सतलोक पहुंच जाता है उसकी इच्छा इधर आने की होती ही नहीं है। इच्छा खत्म हो जाती है। लेकिन यह आते रहते हैं, डोर को वहीं से हिलाते रहते, प्रेरणा देते रहते हैं कि चले जाओ, उसको हमने जिम्मेदारी दिया है, यह काम सौंपा है, वह इस काम को कर रहा है, चले जाओ, वहां सीख जाओगे, समझ जाओगे और फिर उसको करना तो तुम्हारे कर्म कटते जाएंगे, और (नए) इकट्ठा नहीं होंगे।

इस घोर कलयुग में गुरु महाराज ने जीवों को अपनाया, उनके कर्मों को धोने में बहुत तकलीफ हुई

जब से सन्तों का प्रादुर्भाव इस कलयुग में धरती पर हुआ तब से बराबर इसी तरह से सन्तों ने किया। समय परिस्थिति के अनुसार कोई बारह, कोई सोलह लोगों को पार किया। समय परिस्थितियां पहले इस तरह की रही कि कम जीवों को सन्तों ने अपनाया, पार किया। लेकिन गुरु महाराज ने बहुत जीवों को अपनाया। तकलीफ तो हुई गुरु महाराज को धोने सफाई करने में, क्योंकि गुरु महाराज के ऊपर लोगों के कर्मों की बहुत गंदगी आयी।

इस समय दिन-ब-दिन काल और माया चारा डालती चली जा रही

आज के 50-60 साल पहले देश में धर्म-कर्म परिस्थितियां अलग थी। आचार विचार आहार व्यवहार जो लोगों का था अब इस समय नहीं है। अब दिन-ब-दिन खराब होता जा रहा है। अब जीवों को फसाने, मोहित करने के लिए दिन-ब-दिन काल और माया चारा डालती चली जा रही है। 

इस समय लोगों की आंखों में कितनी चंचलता आ गई, अच्छे-अच्छे सतसंगियों की नीयत खराब हो गई

आप देखो कितनी चंचलता आंखों में लोगों के आ गयी। कितने दुनियादारी, इंद्रियों के भोग, लोभ लालच की तरफ आदमी दौड़ने लग गया। अच्छे-अच्छे सतसंगीयों की भी नीयत खराब हो गई पैसा मान प्रतिष्ठा के चक्कर में। जो काम नहीं करना चाहिए, जिसको दुनियादार भी अनैतिक मानते हैं उसको भी लोग करने के लिए तैयार हो जा रहे और कर भी डालते हैं। ऐसे समय में गुरु महाराज जीवों को अपनाए और उनके कर्मों की धुलाई सफाई किया। 




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